सूरज सिंह का जन्म 30 जून, 2003 को 'दिनकर' की धरhती बिहार के नवादा जिले में हुआ था। उनका पालन- पोषण उनके पैतृक गाँव ओढ़नपुर और नवादा शहर में हुआ। दसवीं कक्षा तक उनकी पढ़ाई वहीं नवादा शहर में ही हुई और ग्यारहवीं के लिए वो अपने ननिहाल- साहित्य नगरी, संगम नगरी प्रयागराज (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश चले आए।
सूरज के पिता श्री सुशील सिंह एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक हैं। उनकी माता प्रियंका देवी एक गृहणी है; अन्य सभी माओं की तरह हीं उनके घर को घर बनाती हैं। उनकी एक बहन ऋतु सिंह भी है जो दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन (कॉमर्स) कर रही है।
उन्होंने अपने दसवीं वर्ग ज्ञान भारती पब्लिक स्कूल से (97%) 2018 में पास किया। और इसी साल साथ ही साथ, हाल ही में उन्हें हिंदुस्तान आयोजित ओलंपियाड में ग्यारहवीं क्लास का प्रयागराज टाॅपर घोषित किया गया (See Certificate)। वह अभी विष्णु भगवान पब्लिक स्कूल में बारहवीं की पढ़ाई कर रहे हैं।
सूरज बतातें हैं कि उनके कविताओं के लिखने का सिलसिला सबसे पहले उनके अंग्रेजी के शिक्षक पार्था गुहा के माध्यम से हुआ जिन्होंने नवमी क्लास में "द ब्रुक" नाम से एक कविता के आधार पर ही 'द स्काई' के ऊपर अपने विचारों से अंग्रेजी में कविता लिखने को कहा था और उन्होंने लिख कर उसे दिखाया। हालांकि वह बहुत अच्छी कविता नहीं थी लेकिन बस वहीं से शुरुआत हो जाती है सूरज के कविताओं के लिखने के दौर का।
इसके बाद उन्होंने अपने शिक्षक गुहा जी के विषय पर कविता लिखी। इसके बाद एक और कविता और फिर शुरुआत होती है उनकी पहली हिंदी की कविता का, छुट्टी के दौरान- "विद्यालय के दिन"।
और बस वहीं से सिलसिला शुरू हो जाता है हिंदी कविताओं का- इसके प्रति रुचि, प्रेम और लिखने का। उसी सतत प्रयास, प्रेम से लिखते रहने की एक उपज है "क्यों- दास्तां खोज की"।
सूरज कहते हैं, "मेरा मन हमेशा यह करता था कि जितना भी हो सके अपने सहपाठी, मित्र, प्रतिद्वंद्वी की मदद जरूर करूँ"
जो बच्चे उनके साथ उनके सहपाठी हैं, वो किसी न किसी रूप में उनकी मदद जरूर करना चाहते हैं- बताकर, सिखा कर या फिर वो कोई भी उपयुक्त ढंग से जो संभव हो।
उन्हीं सब छोटे-छोटे समस्या- समाधान बिंदुओं का एक संकलित प्रारूप है "क्यों- दास्तां खोज की"।
क्यों कविता के प्रारूप की रूपरेखा उनके दिमाग में यूं हीं, बस बैठे थे कि अचानक आ गई और उसी प्रारूप को आगे बढ़ाते हुए और उस पर सतत प्रयास करते रहते पूरी होती है ये पुस्तक, "क्यों- दास्तां खोज की"।
कुछ और!
सूरज ने बताया कि वह अभी एक उपन्यास भी लिख रहे हैं जो विद्यालय के जीवन में मिलने वाले ताप पर है। वहां आने वाले बच्चे कैसे अपने घर को छोड़, दूर से दूर पढ़ने चले आते है। उस समय मिलने वाले कनक ताप की पृष्ठभूमि पर आधारित है वह उपन्यास!अपेक्षा है कि सतत प्रयास के बदौलत कुछ और सुंदर कविताओं, कहानियों का आगमन होगा जो आपके लिए जरूर सकारात्मक, उपयोगी सिद्ध होंगे!

Congratulations my friend suraj singh
ReplyDeletebahut sundar!!
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