युगों से होते आए या होने वाले किसी भी समाधान, आविष्कार का रास्ता सवालों से गुजरना उतना ही स्वाभाविक है जितना पहिए का गोल होना और नौ का छः से बड़ा होना। किसी भी समाज की जरूरत, मांग, राजनीति, उत्सुकता, इच्छा इत्यादि की सफलता बस एक ही इमारत पर खड़ी होती है- प्रश्नों की इमारत पर और प्रश्नों के शैली की सबसे नायाब और चुनिंदा हथियार है- "क्यों?"। बस इसी अनोखे हथियार का एक साकारात्मक उपयोग आपके लिए किया गया है जिससे आपका लाभान्वित होना बस किंचित ध्यान- मात्र से शत-प्रतिशत तय है।
प्रस्तुत पुस्तक के तत्वों और भावों की रूपरेखा ठीक उसी ढंग से की गई है जिससे शीर्ष लाभ विद्यालय, कॉलेज, विश्वविद्यालय के छात्र- छात्राओं को होगा या फिर कहा जाए तो वो सब ही लोग जो अपना सफल भविष्यत्- इमारत एक मजबूत, तर्कपूर्ण, समझदार, सुदृढ़ आधारशिला पर करना चाहते हैं। कविताओं के माध्यम से इस पुस्तक में अक्सर परेशान करने वाले लगभग सभी समस्याओं का एक समझदारी भरा समाधान मौजूद है। इस पूरी कविता को गेय अंदाज में लिखा गया है और प्रत्येक खंड का अंत "क्यों" शब्द से है। इसलिए लयमयी अंदाज में पढ़ना आनंददाई है।
जैसे कोई भी किला एक दिन में नहीं बनता उसी तरह यह पुस्तक भी सतत, दीर्घ ध्यान और निरीक्षण पर आधारित है। मेरे आसपास और कक्षा में क्रमशः लोगों और विद्यार्थियों की दिक्कत मुझसे देखी नहीं जाती थी। मैं हमेशा यह जानने की कोशिश करता था कि उनके लिए, हमारे लिए, सबसे सहज, सरल, सफल उपयुक्त मार्ग कौन सा हो सकता है। इसे पता लगाने में गुरु (जग्गी वासुदेव सद्गुरु, धनंजय पांडे), ध्यान, मित्र (साहिल, अनुराग, आशीष, अभिषेक, मोंटी, ऋतु) आसपास की घटनाएं बेहद उपयोगी सिद्ध हुए। उन्हीं सब छोटे-छोटे समस्या- समाधान बिंदुओं का एक संकलित प्रारूप है, "क्यों- दास्तां खोज की"।
इसे लिखने के समय के सफर का वर्णन "क्यों" के इस प्रस्तुत खंड में वर्णित है:
दिन का सूरज, रात का तारा बन हरदम मदमस्त सफर,
दिन को दमक कर, रात चमक कर- जुगनू जैसा, वैसा सफर।
शीत ऋतु में सफर शुरू और अंत बसंत के अंतिम में
छोटा, प्यारा और न्यारा सा, ऐसा था ये सघन सफर।
सांसे रुकी थी, दिल भी थमा था, मन भी विचलित नहीं था यों, आपसे मिलना बस थी ख्वाहिश! होता अधूरा सफर ये क्यों?
अब आप ने इस पुस्तक को पढ़ने की शुरुआत करके सफलता की सीढ़ी चढ़ने की शुरुआत तो कर ही दिया है तो चलिए हम चढ़ते हैं साथ- साथ कुछ और सफलता की सीढ़ियां! और एक मानवीय सफल समाज की संकल्पना को चरितार्थ करने में अपना अभूतपूर्व योगदान देते हैं।
इस लयमयी, रसमयी, तर्कपूर्ण कविता में अपना विश्वास दिखाने के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद! आपके किसी भी सुझाव, समस्या, संदेश आदि का स्वागत है। दिली अपेक्षा है कि ये कविताएं आपके लिए भी उपयोगी और लाभप्रद साबित हो!
धन्यवाद!
आपका मित्र
जैसे कोई भी किला एक दिन में नहीं बनता उसी तरह यह पुस्तक भी सतत, दीर्घ ध्यान और निरीक्षण पर आधारित है। मेरे आसपास और कक्षा में क्रमशः लोगों और विद्यार्थियों की दिक्कत मुझसे देखी नहीं जाती थी। मैं हमेशा यह जानने की कोशिश करता था कि उनके लिए, हमारे लिए, सबसे सहज, सरल, सफल उपयुक्त मार्ग कौन सा हो सकता है। इसे पता लगाने में गुरु (जग्गी वासुदेव सद्गुरु, धनंजय पांडे), ध्यान, मित्र (साहिल, अनुराग, आशीष, अभिषेक, मोंटी, ऋतु) आसपास की घटनाएं बेहद उपयोगी सिद्ध हुए। उन्हीं सब छोटे-छोटे समस्या- समाधान बिंदुओं का एक संकलित प्रारूप है, "क्यों- दास्तां खोज की"।
इसे लिखने के समय के सफर का वर्णन "क्यों" के इस प्रस्तुत खंड में वर्णित है:
दिन का सूरज, रात का तारा बन हरदम मदमस्त सफर,
दिन को दमक कर, रात चमक कर- जुगनू जैसा, वैसा सफर।
शीत ऋतु में सफर शुरू और अंत बसंत के अंतिम में
छोटा, प्यारा और न्यारा सा, ऐसा था ये सघन सफर।
सांसे रुकी थी, दिल भी थमा था, मन भी विचलित नहीं था यों, आपसे मिलना बस थी ख्वाहिश! होता अधूरा सफर ये क्यों?
इस लयमयी, रसमयी, तर्कपूर्ण कविता में अपना विश्वास दिखाने के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद! आपके किसी भी सुझाव, समस्या, संदेश आदि का स्वागत है। दिली अपेक्षा है कि ये कविताएं आपके लिए भी उपयोगी और लाभप्रद साबित हो!
धन्यवाद!
आपका मित्र
सूरज सिंह

समाज में फैली नकारात्मक सोच को सकारात्मक प्रतिक्रिया में बदलने का अत्युत्तम प्रयास
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